विश्वास
भागदौड़ की इस दुनिया में,
अब वक़्त नहीं अपनेपन का,
हर रिश्ता बस ज़रूरत से जुड़ा,
एहसास है अधूरेपन का।
विश्वास के सहारे जीते हैं,
मगर जब टूटता है भरोसा,
साँस तो चलती रहती है,
पर दिल फिर नहीं है सँभलता।
अति- विश्वास के नतीजे से,
इंसाँ भीतर से टूटता है अक्सर,
जो सच्चे दिल से निभाएँ वादे,
वो ही तो अपने होते हैं।
— मुनीष भाटिया
