कविता

क्या सोचते हो मन में

नियम काल के अनुरूप
जरूर बदलते रहते हैं..
इसलिए कि कोई भी सत्य
जग में शाश्वत नहीं है
परिवर्तन एक नियम है
सब कुछ बदलते रहते हैं
पकड़े मत बैठो किसी का
विरासत में मिली है जो
पुस्तकीय ज्ञान वह
चिंतन – मनन में समर्पित
महानुभावों के त्याग का रूप है
ठुकरा मत दो उसे
अपने अनुभव के साथ जोड़कर
दुनिया में चलने का
एक आधार है भविष्य का..
न कि वही यथावत रूप में
अंधानुकरण करने का
स्वार्थ के जाल में
उसको रूढ़ि बनाकर
हुकूमत चलाने का।

मनुष्य को जोड़ना
एक दूसरे के हित में
परस्पर सहयोग करते हुए
कदम – कदम बढ़ाने के लिए
लोगों को तैयार करना
एक दूसरे के मन में प्रेम,
भाईचारे का बीज बोना,
लोक मंगलकारी मानवीय चेतना
हर दिल में विकसित करना
बड़ों का सबसे बड़ी जिम्मेदारी है
अपने आचरण के बल पर
कुछ कर दिखाना असली जीत है
अपने जीवन का कार्य है
समाज के हित में जोड़ना
दिल से सबको स्वीकार करना
आम बात तो नहीं है
वही सार्थक जीवन का मूल है।

पी. रवींद्रनाथ

ओहदा : पाठशाला सहायक (हिंदी), शैक्षिक योग्यताएँ : एम .ए .(हिंदी,अंग्रेजी)., एम.फिल (हिंदी), सेट, पी.एच.डी. शोधार्थी एस.वी.यूनिवर्सिटी तिरूपति। कार्यस्थान। : जिला परिषत् उन्नत पाठशाला, वेंकटराजु पल्ले, चिट्वेल मंडल कड़पा जिला ,आँ.प्र.516110 प्रकाशित कृतियाँ : वेदना के शूल कविता संग्रह। विभिन्न पत्रिकाओं में दस से अधिक आलेख । प्रवृत्ति : कविता ,कहानी लिखना, तेलुगु और हिंदी में । डॉ.सर्वेपल्लि राधाकृष्णन राष्ट्रीय उत्तम अध्यापक पुरस्कार प्राप्त एवं नेशनल एक्शलेन्सी अवार्ड। वेदना के शूल कविता संग्रह के लिए सूरजपाल साहित्य सम्मान।