मानवता पथ
मानवता पथ पर चलें, कल्याणी हो कर्म।
राहगीर बढता रहें, सत्यार्थी निज धर्म।।
भूखे को रोटी मिलें, बेघर को घर-बार।
श्रमजीवी का मान हो, बालक नेह फुहार।।
दर्द-पीर हरना हमें, करना सुख संवाद।
हँसी बाँटते हम चलें, बाँटें भोग प्रसाद।।
मुरझाया अंतस खिलें, महके बाग बहार।
प्रभु वाणी मन में बसे, शुभदा सोच विचार।।
भोर लालिमा खिल रहीं, रवि किरणों का तेज।
चेतन जन गण मन हुआ, आनंदित लबरेज।।
सत्पथ कठिन हो भले, भूलो मत संस्कार।
राहगीर तू जान लें, धर्म-कर्म झंकार।।
— चंचल जैन
