सद्बुद्धि की दो काज
ढुँढ रही है मेरी नजरें दूर दूर तक
अवनि और अम्बर में भी आज
कहाँ छुप गई है जग के मन की शांति
सर पे बाँध अशांति की भारी ये ताज
बम बारूद से भरी पड़ी है ये धरती
हर देश के कण कण में बँधी है गाँठ
वर्चस्व की छिड़ गई है आज युद्घ
कौन बनेगा इस धरा के ताकत सम्राठ
पूरब से पश्चिम तक है यहाँ फैला अब
षड़यंत्र की गंभीर सैकड़ों सम्राज्य
आतंक पहुँच गई जग के पराकाष्ठा पे
कौन बचाये अब जन जन का नाज
विश्व शांति की हो रही है आज कामना
जो करता है जन कल्याण की कोई बात
सर्वे भवन्तु विश्व पटल पे सुखिनाः
ये है हिन्दुस्तान की पुरातन संवाद
नहीं चाहिये गैरों की अर्जित वन संपदा
नहीं चाहये हमें औरों की आँसू का राज्य
पड़ोसी भी हैं हमारे धर्म भाई सब
हे प्रभु दो जग को सद्बुद्धि का काज
— उदय किशोर साह
