ग़ज़ल
जीवन भर मुस्काते रहना।
कलियाँ तुम खिलाते रहना।।
ख़ुशबू तुम फैलाते जाओ।
जीवन को महकाते रहना।
श्रम तुम तो करते ही जाओ।
शैल-शिखर चढ़ जाते रहना।।
दुख आ जाएँ चाहे जितने।
दिल को धीर धराते रहना।।
पहचान बने आज अनूठी।
रिश्ते देख निभाते रहना।।
काँटे बिछते हों राहों में।
रौंद उन्हें जाते ही रहना।।
हो तन्हाई में जो अक्सर।
ग़ज़लें अपनी गाते रहना।।
मिलता है चैन सुनो हर पल।
बच्चों को तुम खिलाते रहना।।
फुर्ती हर पल पानी हो तो।
बागों में ही जाते रहना।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
