कविता वियोग *डॉ. अनीता पंडा 18/10/202518/10/2025 ढलते सूरज ने यूँ कहासमझो ज़िन्दगी का फलसफाजो अपनी रंगीनियों था डूबाअस्ताचलगामी हो डूबाचल रही उदय-अस्त की क्रीड़ाघनीभूत हो रही वियोग की पीड़ा। — डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’