कविता

वियोग

ढलते सूरज ने यूँ कहा
समझो ज़िन्दगी का फलसफा
जो अपनी रंगीनियों था डूबा
अस्ताचलगामी हो डूबा
चल रही उदय-अस्त की क्रीड़ा
घनीभूत हो रही वियोग की पीड़ा।

— डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’

*डॉ. अनीता पंडा

सीनियर फैलो, आई.सी.एस.एस.आर., दिल्ली, अतिथि प्रवक्ता, मार्टिन लूथर क्रिश्चियन विश्वविद्यालय,शिलांग वरिष्ठ लेखिका एवं कवियत्री। कार्यक्रम का संचालन दूरदर्शन मेघालय एवं आकाशवाणी पूर्वोत्तर सेवा शिलांग C/O M.K.TECH, SAMSUNG CAFÉ, BAWRI MANSSION DHANKHETI, SHILLONG – 793001  MEGHALAYA aneeta.panda@gmail.com