कविता

ज़माना है खराब

खुद को सुधारते नहीं कहते हैं ज़माना है खराब
संस्कारों की कमी ने कर दिया सब कुछ बर्बाद
आवोहवा ऐसी बदली की धुआं धुआं हो गया
पंछी उड़ गया जाल से देखता रह गया सैयाद

जुल्फें काली थी अब सफेद हो गई
जिंदगी यूँ ही झमेलों में गुज़र गई
दिल अभी भी समझता रहता है जवान
बहार आई भी और झट से निकल गई

मौके की तलाश में रहते हैं बनते है बहुत स्याने
बढ़ते जा रहे हैं आगे रिश्तों को लगा कर ठिकाने
अपनी अकड़ में रहते है लोग आजकल
रूठने पर कौन जाता है किसी को मनाने

विद्यार्थी अध्यापक को आंख है दिखाता
चोरी करता है जो वह पकड़ में नहीं आता
अपना कसूर हो तो चुप हो जाते हैं सारे
हो दूसरे का तो ज़माना बहुत शोर है मचाता

जुल्म को देख कर भी सामने से निकल हैं जाते
सच्चाई का साथ नहीं देते हैं डर जाते
ज़ुबान पर जैसे हो ताला लगा हुआ सबके
पूछे भी कोई तो कुछ नहीं हैं बताते

देना पड़ेगा सबको अपने कर्मों का हिसाब
लाना पड़ेगा थोड़ा अपने आप में भी बदलाव
बातें बनाने से ही यह दुनिया नहीं सुधरेगी
एक से एक जब मिलेंगे तभी तो आएगी इंकलाब

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र