दीयों की हार, धुएँ की जीत
रोशनी का त्योहार था,
हमने धुएँ-वाला बना दिया।
दीयों का उजाला कम,
पटाखों का गर्जन कर ज़्यादा दिया।
जिस हवा से साँसें मिलतीं,
उसे ज़हर-सा बना दिया।
खुशियों की गलियों में
काला गुबार बिछा दिया।
जहाँ तारों की चमक होनी थी,
वहाँ रात को भी धुँधला दिया।
बच्चों की हँसी-खुशी छीनकर,
खाँसता सा हर शहर बना दिया।
धरती ने पर्व की आस लगाई थी,
हमने आकाश को रुला दिया।
दीप जले थे उम्मीद के,
हमने वातावरण बुझा दिया।
उजाला बाँटने निकले थे,
अपनी साँसों का त्यौहार लूटा दिया।
रोशनी का त्योहार था,
हमने धुएँ-वाला बना दिया।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
