पाप पुण्य की क्या परिभाषा
पाप पुण्य की क्या परिभाषा कहीं हताशा कहीं निराशा
नदी मिलेगी तय सागर में पानी में घुल रहा बताशा
हाथों में रेखाएं भाग्य की कर्मों से बन बिगड़ रही है
एक कोख से जन्मी बेटियां यों आपस में झगड़ रही हैं भाषा
माता श्री के बस में नहीं है दोनों को दे सकें दिलासा
पाप पुण्य की क्या परिभाषा कही हताशा कहीं निराशा
हर जीवन का खेल चल रहा कहीं मेल-बेमेल चल रहा
हर जीवन है सिर्फ परीक्षा एक पास एक फेल चल रहा
मगर ध्येय है हर प्राणी का पूरी हो उसकी अभिलाषा
पाप पुण्य की क्या परिभाषा कही हताशा कहीं निराशा
हम सारे प्राणी पतंग से उड़ा रहा है ऊपर वाला
किसे है कटना किसे काटना रचा है उसने खेल निराला
यह मानव की नादानी है नहीं समझता उसकी भाषा
पाप पुण्य की क्या परिभाषा कही हताशा कहीं निराशा
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
