समझदार हो तुम
फिर मेरे हिस्से में आया,
कोई समझौता नया।
किसी ने कहा —
“तुम तो बहुत समझदार हो”
मैं मुस्करा दिया,
जैसे यह तारीफ़ नहीं,
एक निर्णय हो —
कि अब मुझे महसूस नहीं करना चाहिए।
समझदार लोग
रोते नहीं,
सिर्फ़ मुस्कराते हैं
और भीतर धीरे-धीरे
मरते रहते हैं।
वे तर्कों में ढूँढ़ते हैं सुकून,
जवाबों में छिपाते हैं आँसू,
और चुप रहना
उनकी आदत बन जाती है।
हर बार जब कोई कहता है —
“तुम समझदार हो,”
मुझे लगता है —
मैं थोड़ा और दूर हो गया हूँ
अपने ही दिल से।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
