कविता

अजेय हैं बेटियाँ

किसने कहा —
नारी बस आँचल की सीमाओं में बंधी है,
वह तो तूफ़ान की श्वास है,
जो चट्टानों में भी पथ बनाती है।

जेमिमा के हाथों में सूरज थरथराया,
हरमन की दृष्टि में अग्नि का रंग समाया,
वे चलीं —
तो हर दिशा में उजास झर गया,
और स्वप्नों का आकाश साकार हो गया।

तीन सौ उनतालीस आँकड़े नहीं,
विश्वास की पराकाष्ठा थे —
जहाँ हर रन में माँ का आशीष था,
हर चौके में मातृभूमि की धड़कन।

आज,
भारत की बेटियाँ फिर बोलीं—
“हम सीमाएँ नहीं, संभावनाएँ हैं!”
और पूरा राष्ट्र उनके संग गा उठा —

जय नारी, जय भारत!

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh