उठो अपने सपनों के लिए
भोर का तारा,
अब भी आँखों में है —
चलो उसी ओर।
पंख थके हों भी,
आसमान बुलाए —
विश्वास रखो।
मिट्टी की खुशबू,
कहती है हर पल —
बीज बनो फिर से।
राहें टेढ़ी हैं,
पर कदमों में जिद —
मंज़िल मुस्कुराए।
बादल रुकेंगे,
पर सूरज आएगा —
हिम्मत जगाओ।
स्वप्न अगर टूटे,
तो राख में देखो —
नई चिंगारी।
मन की नदिया,
पत्थरों से कहती —
“मैं रुक न पाऊँ।”
हर गिरावट में,
एक सीख छिपी है —
उठो, फिर बढ़ो।
— डॉ. अशोक, पटना
