प्रो. डॉ. रामदरश मिश्र जी को श्रद्धाजंलि
वो स्वर्णिम कलम जितने उकेरा हर एहसास को शब्दों में पिरोकर,
लिखा बदलते हुए भारत के रंग-रूप को भावों की स्याही में डूबो कर,
सृजन किएं कई भाषाओं व विधाओं में गीत कविताएं ग़ज़लें उपन्यास,
महसूस किया हर मन को ज़मी से फलक तक साथ- साथ में बहकर ।
चलाई कलम हर विषय पर भयहीन और कहीं हर बात खुलकर,
पढ़ा ज्ञान चक्षुओं से मन की छुपी वेदना को मातृभूमि से जुड़कर,
वो अंबर की छाया मिट्टी की सुंगध प्रकृति का कण-कण उल्लास,
आ. प्रो. डॉ. रामदरश मिश्र जी ने की साहित्य सेवा तन मन अर्पण कर ।
निर्मित किया व जिया एक युग रूपांतरण धैर्यशील विनम्र रहकर,
101 वर्ष की आयु को सूर्य सम जिया विश्व में प्रकाश पुंज बनकर,
दे गए ऐतिहासिक साहित्यिक विरासतें यादें और किस्से बहुत खास,
पद्म श्री और अनेक श्रेष्ठ साहित्यिक पुरस्कारों से विभूषित होकर ।
उनका अतुलनीय योगदान चिरकाल तक गूॅंजता रहेगा संगीत बनकर,
ली 31 अक्टुबर 2025 को आख़िरी श्वास प्रभु को धन्यवाद कहकर,
सिखा गये वो मत छोड़ना तुम मेहनत लग्न साहस और आत्मविश्वास,
आ. मिश्र जी अमर हो गए सभी साहित्य प्रेमियों के दिलों में बसकर ।
पदचिन्हों पर हम उनके चल पाएं हे मॉं शारदा हम तटस्थ होकर,
उपासना करें तुम्हारी सत्य की सशक्त दिव्य ज्योत मन में जलाकर,
शब्द नहीं मिटेगें वो दास्तां कहेंगे वो “आनन्द” भाव भरेगें आस-पास,
कल छोड़ कुछ यादें विलीन हो जायेगें हम भी मृत्यु की गोद में सोकर ।
— मोनिका डागा “आनंद”
