समानता की पुकार
समानता की पुकार…
अवहेलना, अपमान मत करो किसी का,
ऊॅंच-नीच, जाति-भेदभाव स्वार्थ का ताज़ा।
मनुष्य के भीतर छिपी लालसा सुख-भोग की,
असमानताऍं लायीं, बिखरें रिश्तों की धरोहर सी।
भाईचारे के इस सुंदर जग में,
धोखा, झूठ, शोषण, वंचना –
मनुष्य ने मनुष्य के साथ
करता आया है अनादि से।
वर्ण और जाति का यह भेद
ईश्वर ने नहीं, मनुष्य ने रचा।
कुटिल तंत्र, बंधे हुए मन का खेल,
अपरिपक्व चिंतन, अपराध का मेला।
अल्प, अबला मत समझो किसी को,
जग में अपना कुछ जोड़ने में वे समर्थ।
शक्तिमान हैं, यह सत्य सब जन जाने,
हर हृदय में बसी उनकी महिमा की कथा।
त्याग, समर्पण हैं सबसे बड़ी शक्तियॉं,
हथियारों से नहीं जीते जा सकते मन और हृदय।
प्रेम, अहिंसा और सेवा-यही विजय का मार्ग,
यही मानवता का अनमोल उपहार।
