सामाजिक

असली शत्रु

मानवीय संबंधों का गणित बहुत ही जटिल होता है कभी ये चिलचिलाती धूप में ठंडी छाँव बन जाते हैं तो कभी इनकी वजह से पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाने जैसी स्थिति भी आ सकती है l सच कहें तो जीवन इन्हीं संबंधों की कहानियों से भरी डायरी जैसा है l कोई कहानी हमारी मन को प्रेम और ऊर्जा से सराबोर कर जाती है तो कोई हमारी तमाम ऊर्जा को सोख ले जाती है l इन संबंधों का सबसे सीमित दायरा होता है परिवार l परिवार की संरचना के भी कई स्तर होते हैं l हमारे देश में संयुक्त परिवार की प्रणाली प्रचलित हैं जितना बड़ा परिवार उतने ज्यादा मतभेद l पर कभी-कभी मतभेद या यूँ कहें कि आपस में टकराते हुए हित शत्रुता का रूप ले लेते हैं l मन के भीतर का नकारात्मक भाव एक दूसरे का नुकसान करने पर आमादा हो जाता है और कभी-कभी समाज में इसका अत्यंत ही उग्र रूप देखने को मिलता है l जो सम्बन्धी कभी एक ही आँगन में साथ खाए और खेले होते हैं वो अपनी शत्रुता को कोर्ट और कचहरी के पन्नों में जीवित करते हुए अपने आपको धन्य समझने लगते हैं l इस तरह ये सम्बन्ध पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहते हैं l

कहते हैं कि मनुष्य की शत्रुता हो या मित्रता उसके गुण हों या दोष सब उसके जीवन तक ही सीमित होते हैं उसकी मृत्यु के बाद सब कुछ ख़त्म … ये एक मानवीय परंपरा भी है कि मृत मनुष्य के गुणों को ही व्याख्यायित किया जाता है l परिवार में जब किसी की मृत्यु होती है तो कुछ सामाजिक – धार्मिक विधानों का पालन करना होता है, मसलन घर के पुरुष सदस्य अपना सर मुंडवाते हैं आदि आदि l जब कोई आत्मीय दुनिया छोड़कर जाता है तो व्यक्ति स्वाभाविक रूप से इन सभी विधानों का पालन कर मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है परन्तु यदि कोई ऐसा व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जो संबंधों की दृष्टि से तो स्वजन हो लेकिन आजीवन उससे वास्तविक संबंध शत्रु का था। ऐसे में एक सामाजिक और धार्मिक दबाव होता है कि उक्त विधानों का पालन होना चाहिए क्योंकि रिश्ता खून का था लेकिन मन ने तो ऐसे सम्बन्ध को कभी स्वीकार ही नहीं किया ।

ऐसी बातों के बीच एक प्रश्न और उठता है कि जो संबंधी हमसे खुलकर शत्रुता निभाता है वो हमारा शत्रु है लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो ऊपर से तो हमारे संबंधी होते हैं पर भीतर ही भीतर जीवन के हर मोड़ पर हमसे शत्रुता निभाने का प्रयास करते हैं और अधिकतर समय तो हम उनके इरादों को भांप भी नहीं पाते। जो घोषित रूप से हमारे शत्रु होते हैं उनसे हम हमेशा सावधान रहते हैं और अपने बारे में कोई भी सूचना उन तक न पहुंचे इसका भी ध्यान रखते हैं पर परिवार में या हमारे आस – पास जो लोग छिपे शत्रु के रूप में होते हैं वो कई बार ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं l ऐसी छिपी शत्रुता के पीछे अधिकांशतः कोई बड़ा कारण भी नहीं होता,ये अक्सर ईर्ष्या का परिणाम होती है। कभी-कभी अपने क्षुद्र स्वार्थों को साधने के लिए भी लोग अपनों का नुकसान कर डालते हैं। ऐसी शत्रुता हर किसी के जीवन में कभी न कभी घटित जरूर होती है इन सब पर हमारा कोई वश नहीं। पर इतना तो तय है कि वो लोग अधिक ईमानदार हैं जो खुल कर शत्रुता निभाते हैं मित्र या हितैषी बनकर लूटते नहीं। कम से कम उनके अंतर्मन की सोच और उनके व्यवहार में कोई बेमेल संगत नहीं रहती। वो हमारे बारे में जैसा सोचते हैं ठीक वैसा ही हमसे रिश्ता निभाते भी हैं।

सही बात तो ये है कि हम केवल अपने कृत्यों और सोच के प्रति जिम्मेदार हो सकते हैं लेकिन दूसरे हमारे विषय में क्या सोचते हैं इस पर हमारा कोई वश नहीं।बस सबसे सही रास्ता ये है कि हम किसी से ज्यादा उम्मीद न पालें और अगर हमें ये पता चले कि कोई अपना हमसे शत्रुता का भाव रखता है तो उससे सम्बन्ध बिगाड़ने के बजाय एक बार उसे और उसकी सोच को समझने का प्रयास करना चाहिए । हो सकता है अगर आप उसकी समस्या को समझकर उसकी सहायता करें तो उसके भीतर से वो शत्रुता भाव समाप्त हो जाए। किसी को सहारा दे देने से हम खुद भी अंदर से और मजबूत हो जाते हैं और हमारी अंदर की मजबूती ही हमें रिश्तों को निभाने और उनसे उपजी चुनौतियों का सामना करने की ताकत देती है। वैसे भी जो चोट अपने अपने देते हैं उसे देने की योग्यता किसी बाहरी व्यक्ति में नहीं होती कहते हैं न – हमें अपनों ने लूटा,गैरों में कहां दम था,मेरी कश्ती वहां डूबी,जहां पानी कम था ।पर ये तो सच है कि कोई भी यात्रा अकेले संपन्न नहीं होती ठीक उसी तरह जीवन की रेलगाड़ी में रिश्तों की सहयात्रा की अनिवार्यता बनी ही रहेगी। बस हमें ये सोचना होगा कि हम रिश्तों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल न करें बल्कि मंजिल की ऊंचाइयों पर पहुंचकर भी उनका हाथ थाम कर रखें।

— लवी मिश्रा

लवी मिश्रा

कोषाधिकारी, लखनऊ,उत्तर प्रदेश गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश