गिरने की होड़
राजनीति ही है
हम नेताओं के उत्थान का तोड़,
इसीलिए हम लगा रहे हैं
नैतिक मूल्यों से गिरने की होड़,
ऐसा कौन राजनीतिज्ञ है
जिसने अपनों को भी ठगा नहीं है,
इस लाइन में कोई किसी का सगा नहीं है,
अब तो नैतिकता का शपथ भी
इन नेताओं ने लेना छोड़ दिया,
चाल चरित्र जैसा भी हो
सारा दिशा ही मोड़ दिया,
आज के बहुत सारे युवा नेताओं को तो
ये भी नहीं पता कि नैतिकता क्या है,
बस व्यक्तिगत लाभ ही
इनके लिए अमृततुल्य दवा है,
झूठ बोलना इनके रग रग में है,
छल कपट इनके पग पग में है,
धोखा देना तो अपने बाप को भी नहीं छोड़ेंगे,
बरसों की बनी बनाई शाख पल भर में तोड़ेंगे,
सुबह एक दल में दिखेंगे,
शाम को दूसरे दल में दिखेंगे,
अब वो समय आ चुका है कि
गिरगिट भी इनसे रंग बदलना सीखेंगे,
झूठे वादे,झूठे घोषणा,झूठे शिलान्यास,
बताइए देश की जनता कितना लगाये इनसे आस,
अपनी ही नजरों से गिरा हुआ नेता
अब ज्यादातर लोगों को स्वीकार है,
गिरा हुआ नेता बनना जन्मसिद्ध अधिकार है,
गिरने की कला सिखाने का इंतजाम होना चाहिए,
ऐसे नेताओं को सहस्त्रों सहस प्रणाम होना चाहिए।
— राजेन्द्र लाहिरी
