बिहार चुनाव परिणाम: एक विश्लेषण
बिहार के विधानसभा चुनावों के परिणामों की व्याख्या बहुत से लोगों ने अनेक प्रकार से की है। कुछ लोग इसे मोदी-योगी-शाह का करिश्मा बता रहे हैं, कुछ इसे एनडीए से सुशासन का परिणाम कह रहे हैं, तो कुछ इसको लालू के कुशासन से जोड़ रहे हैं। हो सकता है कि इन सबका थोड़ा-थोड़ा प्रभाव हुआ हो, लेकिन मेरी दृष्टि थोडी विस्तृत है।
सबसे पहले हम बढे हुए मतदान प्रतिशत की चर्चा करें। सबको ज्ञात है कि इन चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग द्वारा बिहार में एसआईआर की कवायद की गयी थी, जिसमें मृत और स्थायी रूप से निर्वासित हो चुके 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गये थे और लाखों उन लोगों के नाम भी काटे गये थे, जिनके पास अपनी नागरिकता या स्थायी आवास सिद्ध करने के कागज नहीं थे। इस प्रकार मतदाता सूची में केवल वे लोग रह गये थे, जो वास्तव में और जीवित मतदाता हैं। उनमें से लगभग उतने ही लोग वोट डालने गये, जो हमेशा जाते रहे हैं। इससे मतदान प्रतिशत तो बढ़ गया, क्योंकि कुल मतदाताओं की संख्या कम हो गयी थी, परन्तु इससे मतों की संख्या में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। इसकी पुष्टि 2020 और अब 2025 में हुए कुल मतदान के आँकड़ों की तुलना करके की जा सकती है।
दूसरी बात, इस बार मतदान करने वाली महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक रही। इसका कारण यह था कि नीतिश कुमार की सरकार ने महिला मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी योजनाएँ चलायीं या उनकी घोषणा की, जिनका सीधा प्रभाव घर-गृहस्थी पर पड़ता है। इसीलिए बहुत सी महिलाओं ने अपने परिवार के पुरुषों की नाराजगी की चिन्ता किये बिना एनडीए के पक्ष में मतदान किया और पूरे उत्साह से किया, जिससे महिला मतदान की संख्या बढ़ गयी।
तीसरी बात यह रही कि चुनाव आयोग की सतर्कता और योजना से इस बार मतदान शान्तिपूर्ण रहा। इसका पता इस बात से चलता है कि कहीं से भी हिंसा का कोई समाचार नहीं आया और एक भी बूथ पर दोबारा मतदान नहीं कराना पड़ा। इसलिए अधिक, शान्तिपूर्ण और निर्भय मतदान का श्रेय चुनाव आयोग को भी दिया जाना चाहिए। इससे लोकतंत्र निश्चित रूप से मजबूत हुआ है, भले ही विपक्षी नेता पप्पू कितना भी दुष्प्रचार करते रहें।
बिहार ने पूरे देश को और विशेष रूप से चुनाव आयोग को जो मार्ग दिखाया है, उसका लाभ अन्य राज्यों में अवश्य मिलेगा, जिनमें शीघ्र ही चुनाव होने वाले हैं। शर्त यही है कि वहाँ चुनाव कराने से पहले एसआईआर को पूरी निष्ठा से चलाकर पूर्ण किया जाये, ताकि सभी अवैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाये जा सकें।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
मार्गशीर्ष कृ. 11, सं. 2082 वि. (15 नवम्बर 2025)
