गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सौदा करने हम जो बढ़ते हर क़दम घाटा मिला।।
चल पड़े जो राह में ही हर तरफ़ काँटा मिला।

बरसात में जब हम मिले बढ़ गयीं नज़दीकियाँ।
हम तो समझे कि हमें था साथ यह प्यारा मिला।।

था खुशी का ऐसा आलम आपा हम खो दिये।
सबसे अच्छा देखते ही वह सजन न्यारा मिला।

ज़िंदगी देख लो हमारी हुई गुलज़ार तभी।
हम कहें इक बागवां गुनगुनाता हँसता मिला।।

दूर न जाने क्यों गये छाने लगीं मायूसियाँ।
सुबकती रुसवाइयों में सुलगता लम्हा मिला।

ज़िंदगी का सूर्य अब तो देख ढलने ही लगा।
टिमटिमाता हर सितारा अब हमें रुसवा मिला।।

दर्द बढ़ता ही गया जो ज़ख़्म हमको दे गये।
जब से देखा तुमको है नासूर बढ़ता मिला।।

दिल में देखो हैं घुमड़ती काली परछाइयाँ।
( साज़िशों की भीड़ में हर आदमी तन्हा मिला। )

जो भेजा ही हमने तुम्हें था ख़त वही तो सुन।
देखते ही हमको वही तो तब छिनारा मिला।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’