बाल कविता
बैठ चादनी के रथ चंदा
मामा के घर जाऊँ।
आसमान से तोड़ सितारे
आँगन में लटकाऊँ।।
चिडिया मुझे सिखा देवे यदि
उड़ना फुर फुर फुर फुर
घर घर जाकर रोज सुनाऊँ
चहचाहट वाले सुर।।
माली काका इतने पेड़
बने कैसे समझाओ।
रंग बिरंगे फूल कहाँ से
लाए रंग बताओ।।
भरता पानी कौन घटा में
बरखा कौन कराता।
कौन बदल कर इन ऋतुओं में
गर्मी सर्दी लाता।।
माँगू मैं भी पंख उसी से
तितली सी उड़ पाऊँ।
उपवन उपवन घूमूँ दिन भर
फूलों पर मँड़राऊँ।।
— सतीश बंसल
