उलझन
इस दुनिया में ऐसा कौन है,
नहीं है जिसके जीवन में उलझन,
झोंक देते हैं लोग उबरने इस स्थिति से
और कर लेते हैं स्वाहा अपना तन-मन,
उलझनें कई प्रकार के हो सकते हैं,
कुछ हंस सकते हैं तो कुछ रो सकते हैं,
किसी को जीने की उलझन,
किसी को पीने की उलझन,
कुछ को सीखने की उलझन,
कुछ को लिखने की उलझन,
किसी की उलझन ज्यादा मद पाने की,
किसी की उलझन उचित पद पाने की,
और किसी की अहसान जताने की,
किसी के अहसानों के बोझ में दब जाने की,
बहुत गुजार देते हैं जीवन
गुलामी में सर नीचे धर के,
कई ऐसे भी होते हैं जो कुछ बड़ा कर जाते हैं
व बहुतों की जिंदगी बना जाते हैं खुद उबर के,
बिना चुनौती,बिना उलझन भी क्या जिंदगी होगी,
पुरखों की संपत्ति खाये जाएंगे बन कर रोगी,
हर उलझन से मजबूत होने का इरादा कीजिए,
मजबूत हो देश यह सोचने का वादा कीजिए।
— राजेन्द्र लाहिरी
