कैसे बचेगा मुंशीगिरी
मुझसे एक दिन बोला सुधीर कुमार,
कि सच सच बताओ यार,
सामंतों के मुंशियों की मुंशी शाही,
कैसे बचती है जब आये तबाही,
मैं जवाब न पा हड़बड़ा गया,
किंचित सकुचा गया,
तब खुद बोले सुधीर,
सुनो रखकर धीर,
उन्हें आरामतलबी की लत है,
उन्हें मिल जाती सदा सत्ता की महक है,
पर हम तो सदियों से संघर्षों के आदी हैं,
पहले भी हम जुल्मद्रोही प्रवृत्ति के थे
और आज हम अम्बेडकर वादी हैं,
जुल्म ज्यादतियों से भिड़ने का हमारा नाता है,
संघर्ष करके ही हमने हर चीज पायी है,
हमारा नहीं कोई भी अलौकिक विधाता है,
सौ साल तक हमारी यही स्थिति रही
तब भी हम तनिक नहीं घबरायेंगे,
विद्रोही थे,हैं और वही तेवर बरकरार रख जायेंगे,
पर उनका क्या वो आज फड़फड़ा रहे हैं,
तनिक पद पॉवर घटते ही बिलबिला रहे हैं,
उन्हें सत्ता की आदत पड़ी है,
हमारा संघर्ष बता रहा है कि
आगे सुनहरा,सुखद भविष्य खड़ी है,
सत्ता दूर होते ही वो खोने लगेंगे अस्तित्व,
मिट जाएगा भ्रम दिलाता व्यक्तित्व,
हम जैसे हैं वैसे और रह लेंगे,
कुछ दुख और सह लेंगे,
जो खाते रहे हैं मिष्ठान युक्त केसर मिसरी,
कैसे बचायेंगे सामंतों की मुंशीगिरी।
— राजेन्द्र लाहिरी
