जब मैंने लेखनी उठायी
सारा दुख सारा दर्द मैंने हूबहू बतायी,
जब मैंने स्वतंत्र लेखनी उठायी,
उड़ेल दिया जग वालों के सामने
जो आज भी बीत रहा हम पर,
वो सोच रहे हम जी रहे हैं उनकी रहम पर,
वो कस रहे राह चलते बहन बेटियों पर फब्ती,
वो अमानवीय नियम और उसकी सख्ती,
घड़े को छू लेने पर मिलती मौत,
उनको देखकर सर पर चप्पल रखने का खौफ़,
समाज से दूर करने का फरमान,
सिमट कर रह जाते सारे अरमान,
जब तब अस्पृश्य बताने की धृष्टता,
ऊपर से समता लागू बताने की दुष्टता,
ऊंचनीच की तगड़ी मोटी दीवार,
दीवार नहीं गिरा तस स्थिति रखने का विचार,
बाहर खोज रहे आदर व सम्मान,
खुद कर रहे मानवीयता का सरासर अपमान,
संविधान के होने पर भी देख रहे कैसे कैसे दिन,
घूम फिर आ जाता साम्प्रदायिकता का जिन्न,
महान देश के माननीय क्यों नहीं करते रहम,
कब तक पाले बैठे रहेंगे सर्वश्रेष्ठता का वहम,
छलनी हुए हृदय की जब बताता हूं बात,
होता नहीं काबू और उमड़ आता है जज्बात।
— राजेन्द्र लाहिरी
