कुण्डली/छंद

कुण्डलिया छंद 

सुंदर था आँगन सजा, घर-घर महके फूल।

खोई माटी की महक, उडती है अब धूल।।

उडती है अब धूल, बंद रहते दरवाजे।

अपनों का था गाँव, मौन अब ढोलक बाजे।। 

फैशन की है होड, गाँव शहरों सा मंजर।

मन में हैं विश्वास, सजेगी माटी सुंदर।।  

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८