गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

दुख को सीने औ`पिरोने के सिवा कुछ भी नहीं
पास अब ख़ुद को ही खोने के सिवा कुछ भी नहीं

उड़ गया देह का पंछी अनंत नभ में ज्यों
पास अब उसके है रोने के सिवा कुछ भी नहीं

दर्द बेताल सा लटका है मेरे कांधे पर
इसको ताजिंदगी ढोने के सिवा कुछ भी नहीं

काम नदियों का यही रह गया है अब शायद
गठरियां पाप की धोने के सिवा कुछ भी नहीं

सोई रहती है जो तक़दीर किसी की तो फिर
काम होता है क्या सोने के सिवा कुछ भी नहीं

— डॉ. ओम निश्चल