रेवड़ी पुरस्कार परिपाटी और हिंदी साहित्य का आकलन
हिंदी साहित्य को लेकर एक ज्वलंत सवाल आजकल उठ रहा है। उठना स्वाभाविक भी है। उठना चाहिए भी। विश्व की सबसे बड़ी भाषा होने का गौरव और उसकी साहित्यिक उपलब्धि नगण्य। यह अपमान न केवल हिंदी साहित्य का है अपितु हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य साधक और हिंदी प्रेमियों का भी है। विश्व स्तरीय नोबेल पुरस्कार से आज तक वंचित है हिंदी साहित्य। जबकि हिंदी साहित्य का भंडार बहुत बड़ा, बहुत समृद्ध है। जब से सोशल मीडिया ने आम जन को अपना सहचर बनाया है तब से हिंदी कलमकारों की संख्या मच्छरों से भी तेज दर से बढ़ रही है। पुस्तक प्रकाशन प्रतिष्ठान महानगरों, नगरों से होता हुआ कस्बों तक पांव पसार रहा है। पुस्तक विमोचन एवं लोकार्पण समारोह की बाढ़ आ गई है। अर्थात् हिंदी साहित्य सृजन खूब….खूब हो रहा है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि हिंदी में स्तरीय सृजन का अभाव है। फिर भी सखेद यह स्वीकार करना ही होगा कि विश्व पटल पर हिंदी साहित्य की पहुंच न के बराबर है। नोबेल समिति की नजरों से ओझल है। वैश्विक चर्चा से बाहर है। हिंदी से जुड़े हर व्यक्ति के लिए यह सोचनीय विषय होना चाहिए।
इसपर गम्भीरता से विचार करने पर निष्कर्ष स्वरूप इसके तीन कारण मिले। इसका पहला कारण साहित्यिक प्रदूषण है। जब वांछित और अवांछित वस्तुएं एक साथ विपुल मात्रा में बिखरी हों तो प्रदूषण बन जाती हैं। आज का हिंदी साहित्य इसी दौर से गुजर रहा है। हर वर्ष लाखों लेखक और हजारों पुस्तकें हिंदी साहित्य में अनचाहे अतिथि की तरह आकर कुंडली मार रही हैं। दम घोंटू प्रदूषण फैल रहा है। एक-दो स्तरीय पुस्तक, बेशुमार पुस्तकों की अनचाही भीड़ में ऐसे छुप रही हैं जैसे रूई के ढेर में सुई। परिणाम- स्तरीय पुस्तकें नजरों से ओझल रहने को विवश हैं।
इसका दूसरा कारण है- हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद की कमी। योग्य हिंदी-अंग्रेजी अनुवादक की संख्या बहुत कम है। कुछ अनुवादक हैं भी तो वे हिंदी की स्तरीय पुस्तकों को चुन नहीं पा रहे हैं। इसके पीछे भी उपरोक्त प्रथम कारण लागू है जिसे साहित्यिक प्रदूषण कहते हैं।
तीसरा और सबसे प्रमुख कारण है हिंदी साहित्य में रेवड़ी पुरस्कार परिपाटी का फलना-फूलना। हिंदी साहित्य में यद्यपि यह दोष दशकों पुराना है। राजनीतिक घराने में पुस्तकों का स्तर और उसपर लुटाने वाले पुरस्कार तय किए जाते हैं। यद्यपि ऐसी समितियों में एकाध साहित्यकार भी होते हैं लेकिन वे मुखर न होकर, मौन ही रहते हैं। कदाचित इसी विशेषता के कारण रबर स्टैम्प बनाकर वे पदारूढ़ किए गए होते हैं। उनका मुख्य कार्य प्रायोजित निर्णय में हामी भरना ही होता है। यह तथाकथित चंडाल चौकड़ी पुस्तक से अधिक पुस्तक के लेखक से प्रभावित होती है। पुस्तक के सोंदर्य सौष्ठव से अधिक लेखिका का सौंदर्य इन्हें आकर्षित करता है। लेखक का धनबल, व्यक्तिगत संबंध एवं लाभ-हानि का आकलन करके पुस्तक को पुरस्कृत किया जाता है। और फिर पुरस्कार दर पुरस्कार की बरसात होने लगती है। एक पुरस्कार पर दर्जन भर पुरस्कार का अतिरिक्त लाभ। इसलिए ऐसे छल छद्म भवन में स्तरीय पुस्तकें पहुंचती ही नहीं हैं और कूड़ा-करकट जैसी पुस्तकें अपने लेखक को कुबेर बना देती हैं।
मनुष्य का प्रायः यह स्वभाव होता है कि पुरस्कृत/ सम्मानित पुस्तकों को सर्वोत्तम एवं सर्वोत्कृष्ट मानकर पढ़ता है। जब उसको पुरस्कृत पुस्तक के रूप में निम्न स्तरीय पुस्तकें ही मिलती हैं तो वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यहां तो ऊंची दुकान – फीका पकवान है। अर्थात् उन पुस्तकों को पढ़कर न केवल वह निराश होता है बल्कि अन्य पुस्तकों को देखे/ पढ़े बिना ही निकृष्ट मान लेता है। माने भी क्यों नहीं? जब नमूना (सैम्पल) ही खराब है तो माल कौन लेना चाहेगा! कोई भी नहीं न। यही कारण है कि विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य को दोयम दर्जे का माना जाता है।
अगर हिंदी साहित्य को पुनः मान-सम्मान दिलाना है तो हिंदी साहित्य को प्रदूषण मुक्त करना होगा। हिंदी- अंग्रेजी अनुवाद को बढ़ावा देना होगा। पुरस्कारों/ सम्मानों को न्यायोचित एवं पारदर्शी बनाना होगा। पुरस्कारों/सम्मानों से इतर भी स्तरीय पुस्तकों को ढूंढ़ कर उसपर व्यापक चर्चा करानी होगी जिससे वे नजर में आएं।
— डॉ अवधेश कुमार अवध
