भाषा-साहित्य

लेखन-कर्म यानि?

पिछले तीन चार दशकों से हाथ से लिखना काफी कम हो गया है। शिक्षा संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में हाथ से लिखने की बजाय कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल पर लिखने को आधुनिकता का प्रतीक माना जाने लगा है।असल में मनुष्य हजारों वर्षों से हाथों से एक विशेष ढंग से दबाव डालकर लिखता आया है। हाथों की अंगुलियों से मस्तिष्क के विभिन्न हिस्से जुड़े हुये हैं। सोचने, विचारने, प्रतिक्रिया करने और लिखने में परस्पर जुड़ाव है।इन सभी में यदि तालमेल रहे तो किसी व्यक्ति के सोचने, विचारने, चिंतन करने,तर्क करने, भावनाओं को सहेजने, स्मृति की मजबूती और लेखन कला में परिपक्वता आती है।जब से हाथों से लिखना कम होकर कंप्यूटर,लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन पर लिखना शुरू हुआ है विद्यार्थियों, शोधार्थियों , शिक्षकों, लेखकों आदि सभी की मस्तिष्कीय शक्तियों में गिरावट आना शुरू हो गया है। जिंस मानव मस्तिष्क की बनावट हजारों वर्षों के दौरान एक विशेष ढांचे में कार्य करने के लिये हुई है, उस ढांचे को बदल देने से मस्तिष्क अपने आपको नये ढांचों में एकदम से ढाल नहीं पा रहा है। और भविष्य में ऐसा जबरदस्ती से किया जाता रहा तो यह डर है कि मानव मस्तिष्क अपना संतुलन पूरी तरह को दे या अतिरेक से ग्रस्त होकर विध्वंशक निर्णय लेकर स्वयं के विनाश का कारण बन जाये। लिखना कोई केवल आदत न होकर मानव मस्तिष्क की स्थिति में बदलाव करने का एक अभ्यास भी है। व्यक्ति लेखन के माध्यम से अपने सुख, संतुष्टि, तृप्ति,अहोभाव,दुख,दर्द,तनाव, हताशा, निराशा, कुंठा, अकेलेपन, चिंता ,उलझन आदि की अभिव्यक्ति करके खुद को हल्का और निर्भार महसूस करता है।लेखन के द्वारा व्यक्ति अपनी नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलकर अपने जीवन को सृजनात्मक दिशा दे सकता है। इससे उसके लेखन और भावाभिव्यक्ति में स्पष्टता और गहनता आती है। विदेशों में तो आजकल ‘लेखन चिकित्सा’ भी शुरू हो चुकी है, जिसके माध्यम से लोगों को मानसिक बिमारियों से राहत प्रदान की जाती है।भारत में हजारों वर्षों से श्रूति परंपरा के साथ लेखन परंपरा भी मौजूद रही है।
आधुनिक शोधों से भी यह सिद्ध हुआ है कि लेखन से मस्तिष्क के चिंतन करने , सोचने, विचारने, निर्णय लेने, स्मृति को संभालकर रखने आदि सभी मजबूत होते हैं तथा विभिन्न प्रकार के दर्द,कष्ट, तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है। इसलिये व्यक्ति के लिये यह आवश्यक है कि वह अधिकतर हाथों से लिखे, प्रतिदिन लिखे, प्रतिक्रिया देने से पहले लिखे और लिखते समय लिखने पर ही होश को केंद्रित बनाये रखे। इससे उसके लेखन में तो सुधार होगा ही, इसके साथ -साथ वह जीवन की चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझकर उनका सामना करने में समर्थ होगा।जब भी कोई व्यक्ति अपने विचारों, चिंतन और भावनाओं को हाथों के द्वारा लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त करता है,तो उसके मस्तिष्क के वो हिस्से अधिक सक्रिय होते हैं,जो किसी भी खतरे,बाधा और रुकावट के समय पर सक्रिय सहयोगी की भूमिका निभाते हैं।
एकतरफा विज्ञान और तकनीक के अंधभक्त कुछ लोग इस पर यह आपत्ति करेंगे कि इस तरह के लेखन से हम विकास की दौड़ में पीछे छूट जायेंगे। लेकिन हमे समझना चाहिये कि विकास किसके लिये हो रहा है? विकास से उपलब्ध सुविधाओं का भोग कौन करेगा? विकास के केंद्र में कौन है? आधुनिक विकास के केंद्र में मनुष्य प्राणी है। स्वार्थ, लालच और बेहोशी में अंधा होकर उसे खुद के सिवाय अन्य कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। विकास का मतलब तो संपूर्ण सृष्टि में मौजूद हरेक प्राणी को केंद्र में रखकर विकास होना चाहिये। धरती पर सभी को सुखपूर्वक जीने का अधिकार है। कुछ समय के लिये यह मान भी लें कि विकास का मतलब केवल मनुष्य प्राणी का ही विकास है,तो भी यह आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य नामक प्राणी अपने शरीर,शरीर के विभिन्न अंगों,शरीर के विभिन्न तंत्रों,मन और मानसिक अवस्था, स्मृति -शक्ति, धारणा-शक्ति आदि को मजबूत बनाये रखे। यदि आधुनिक विज्ञान, वैज्ञानिक खोजों और तकनीक के अतिशय इस्तेमाल से व्यक्ति कमजोर हो रहा है, तो उसे नये विज्ञान, वैज्ञानिक खोजों और तकनीक पर सिरे से सोचना चाहिये। अंधाधुंध कुछ भी करना न तो व्यक्ति के लिये ठीक है,न समाज के लिये ठीक है,न राष्ट्र के लिये ठीक है तथा न ही मानवता के लिये ठीक है।
लेकिन यहां पर यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि भीतर से भाव, सोचना,विचार,चिंतन आदि कुछ भी नहीं है लेकिन जोर- जबरदस्ती और तुकबंदी करके सिर्फ खुद को लेखक,कवि या साहित्यकार कहलवाने के लिये कागज काले करना भी मन, मस्तिष्क, परिवार और समाज के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकता है। पिछले तीन -चार दशकों से ऐसे हानिकारक लोगों की बाढ़ सी आई हुई है।इस संबंध में आवश्यक यह है कि अपने लेखन- कर्म को अपनी भावनाओं,अपने आवेगों और संवेगों,अपने दुख- दर्द, अपने सुख- दुख,अपने जन्म- मरण, अपने कर्तव्य -अकर्तव्य तथा अपने विचारों,अपने चिंतन और अपनी जीवन-शैली से जोड़कर महत्व देना शुरू करें।केवल तभी स्वाभाविक लेखन बाहर आयेगा और वह निर्जरा का भी काम करेगा।लेखन -अनुशासन को तिलांजलि देने से अपरिपक्व श्रोताओं की वाहवाही तो मिल जायेगी, पुरस्कार भी मिल जायेंगे तथा पद प्रतिष्ठा भी नसीब हो जायेंगे, लेकिन आत्मतृप्ति, आत्मसंतुष्टि और आत्मसम्मान उपलब्ध नही होगा।कुछ ऐसा है जो भीतर से कचोटता रहेगा। भीतर एक टीस और खालीपन बना रहेगा।एक अच्छा ,सफल और आत्मतृप्त लेखक कभी भी जुगाडबंदी, चापलूसी,तिकड़मबाजी, गाडफादर, राजनीतिक पहुंच और साहित्यिक किलेबंदियों का सहारा नहीं लेता है।यह आवश्यक नहीं है कि नाम कमाने या पुरस्कार पाने के लिये ही लिखना है।अपने आपको,अपने मस्तिष्क, अपने श्वासोच्छवास,अपनी भावनाओं,अपने विचारों और अपने व्यवहार -इन सभी में संतुलन और तालमेल बनाने के लिये भी लेखन- कर्म हो सकता है। इसके लिये प्रतिदिन नियमित दैनिकी लिख सकते हैं।लेखन का संबंध लेखक या कवि या साहित्यकार बनने से हटाकर अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक क्षमताओं में संतुलन साधने से भी जोड़कर देखना शुरू करें। थोड़ा बनी -बनाई लीक से हटकर भी कुछ करना आवश्यक है।

— डॉ. शीलक राम आचार्य

आचार्य शीलक राम

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