दूर रहने का मशवरा
सूरज ढलते ही
साया भी पीछे हटता
चुपके से चला जा
पक्षी उड़ते हैं
अम्बर की ओर धीरे
मिट्टी भी कहती
नदी की लहरें
पथिक से दूरी बनाएं
सांझ की ठंडक
पेड़ की छाया
अजनबी से मुख मोड़ती
वृक्ष गवाह है
बगिया में फूल
फूलों का रंग फीका हो
पर खुशबू रहे
चाँद की रोशनी
सड़क पर पड़ती पर तनहा
साया याद रखे
हवा के झोंके
सदियों का संदेश लाए
सुनो, दूर रहो
सन्नाटा बोले
शहर की गलियों में
कदम भी थम जाए
सांझ की नींद
पक्षियों की पंख फड़फड़ाए
शांति का संदेश
सफर में अकेला
पगडंडी भी राह बताती
धीरज रखो तुम
सागर की लहर
कपोल पर टकराकर कहे
कभी पास मत आ
नभ की ऊँचाई
शब्दों की दूरी बनाएं
वाणी मधुर रहे
पत्थर भी सिखाए
स्थिर रहो, दूर रहो
समय सब कहे
— डॉ. अशोक
