गीतिका/ग़ज़ल

बात निराली है

जिन गलियों में बचपन बीता, उनकी बात निराली है,
लुकाछिपी आइस पाइस, खेलों की बात निराली है।
सारा गाँव था एक हवेली, सबसे रिश्ते नाते होते थे,
रिश्तों में अपनापन गहराता, गाँव की बात निराली है।
आज तलक भी वह रिश्ते नाते, सारे हमको याद हैं,
घेर वाली नानी के घर, मक्खन की बात निराली है।
झोटा बुग्गी साही सवारी, कभी ऊँट गाड़ी होती थी,
रोज़ खेत जा रहट पर नहाना, यादों में बात निराली है।
नहीं पता था जाति धर्म क्या, भेद अमीरी का न जाना,
प्यार भरा था सब रिश्तों में, रिश्तों की बात निराली है।
सम्मान बड़ों का होता था, जात पात की बात नहीं थी,
मेहमान गाँव में सबका होता, मान की बात निराली है।

— डॉ अ कीर्तिवर्द्धन

Leave a Reply