आनंदाश्रम
आनंदाश्रम में आज उत्सव का माहौल था। सब अपने-अपने ट्रैक सूट सही है या नहीं जांच रहे थे। फीतेवाले जूते पहन हर कोई दौड़़ने को लालायित था। माना, किसी को कमर दर्द की शिकायत थी, कोई लंगडाता चल रहा था, कोई जल्द थक जाता था।
अंतर्मन सबका उल्लसित था। आज वृद्धाश्रम में ‘खेल दिवस’ मनाया जाएगा। अद्भुत संकल्पना ने सबके मन में जोश भर दिया था। हर कोई चहक रहा था, जैसे बचपन लौट आया हो।
खेल मैदान में इकठ्ठे हुए सब। मंगल दीप प्रज्ज्वलित कर गणेश वंदना कर मंगल गान से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। निर्मला जी जो बेटे को याद करते हमेशा मुरझाई-सी रहती थी, तन्मय होकर गा रही थी। सरस्वती वंदना सुमंगला जी के दीपक नृत्य से प्रस्तुत हुई। अध्यक्षीय वक्तव्य के बाद खेल संपन्न हुए। चाय नाश्ता कर सब पुनः अपनी-अपनी जगह विराजित हुए। साहित्यिक पर्व में विविध भाषाओं में रचनाएं पढ़ी गई। छोटी-छोटी नाटिका प्रस्तुति कमाल की थी।
अब बारी थी पारितोषिक वितरण की। चेहरे पर झलकता बचपना, मासूम खिलखिलाहट, अशेष खुशियाँ…माहौल सतरंगी हुआ था।
लेकिन सबकी नजरें किसी अपने को ढूँढ रही थी। वे उन्हें अपना ‘बक्षिस’ दिखाना चाहती थे।
चाहे कोई अपना नहीं था वहां, लेकिन सब एक दूसरे के लिए अपने ही थे। वृद्धाश्रम की पीर एक दुसरे की हँसी में भूला दी गई।
जोश, जुनून के साथ एक दुसरे का संबल बन अगले उत्सव को मनाने की तैयारी में सब व्यस्त हो गए।
