कितने ही जयचंद यहाँ
कितने ही जयचंद यहाँ जो पीठ में छूरा भोक रहे!
कहते दिलदार भेडियों को माँ की छाती को नोंच रहे।
गद्दार लबार देशद्रोही भेड़ियों को दर्पण क्या देना!
जो रक्तपान करते आये उनके तर्पण से क्या लेना!
क्या अग्नि रफेल सुखोई का हम आचार बनाएंगे।
जनता के खून पसीने को बस राजपथ में सिचवाएँगे।
हे पार्थ बात अब बहुत हुई अब दिब्य शस्त्र संधान करो!
दुश्मन को चीर के चार करो या गद्दी से प्रस्थान करो!
आँखे कोटर से बाहर हों जो आँख उठी है माटी पर।
अब शांति यज्ञ की बात नहीं नरमुंड पड़े हों घाटी पर।।
खूब उड़ाए श्वेत कबूतर जिनको दुश्मन खा बैठा!
सौ बार छला छलते छलते छाती पर है अब आ बैठा।।
अंतस पर घात करे दुश्मन हम ओमशांति का जाप करें।
यह शौर्य नहीं कायरता है यदि हम उस पर न घात करें।।
लातों बाले भूत कभी बातों से मान नहीं सकते!
जो भाषा दुश्मन समझ सके उस भाषा से समझा सकते।।
यह नहीं सहा जा सकता कि सिंघों पर गीदड़ घात करें।
या कोई फिर जयचंदी कर पृथ्वीराज को मात करे।।
सबसे पहले घर के घाती जयचंदों की पहचान करो!
पागल हुर्रियत कुत्तो को जल्दी ही कारागार करो!!
याद करो कुछ पहले ही तुमको सुर्पनखा भायी थी!
माँ के लालों को निगल गई अपने भाइयों को लायी थी!!
हे पार्थ भगीरथ बनो और अब अस्त्र शस्त्र सज्जित करलो!
यह अमर भूमि बलिदानी है इस माटी का बंदन करलो!!
पैंसठ और इकहत्तर छेड़ो ऑप्स विजय सा वॉर करो!
अब और सुरक्षित राह नहीं अब हर सीमा को पार करो!!
पुलवामा शहीद जवानों को शत शत नमन।
— गणेश दत्त गौतम
