यह कैसा कर्तव्य
भाई यह कैसी रहीं ‘माता-पिता’ की माया,
घर में हुए दो मुख्यमंत्री बेटा पढ़ न पाया।
क्यों? नहीं समझ पाए ये शिक्षा का महत्व,
क्या? ‘क्रिकेट’ में समाया था सम्पूर्ण सत्व।
इन ‘पालकों’ ने यह कैसा निभाया कर्तव्य,
स्वघोषित मुख्यमंत्री होना यहीं भवितव्य।
स्वयं अपने ही पास जब रखीं है लालटेन,
क्यों? ना दी पढ़ने के लिए उसे कॉपी-पेन।
पता नहीं कहां-कहां फैला था जंगल राज,
घुलना थे इनके कानों में नम्रतारूपी साज़।
तब बन पाते यहीं ‘जनमानस’ की आवाज,
दिलों पर करते राज मिलती सत्ता परवाज़।
— संजय एम तराणेकर
