जन्म और मृत्यु
जन्म है सूरज-सा उगता,
मृत्यु है ढलता उजियारा,
बीच में जीवन की धुन है,
चलना-रुकना एक सहारा।
मां की गोद में पहली धड़कन,
स्वप्नों का कोमल स्पंदन,
कदम-कदम पर सीखें हम सब,
रचते अपना एक जीवन।
आशाओं के दीप जलाए,
मन में नई उमंगों की धारा।
जन्म है सूरज-सा उगता…
थकी किरण जब ढलने लगती,
तम की बाहें गहरी होतीं,
जीवन का संगीत अधूरा
धीमे-धीमे सोता-जागती।
बंधन सारे टूट गिरेंगे,
खुल जाएगा अनंत का द्वारा।
मृत्यु है ढलता उजियारा…
चलना-सिखला जाता जन्म,
रुकना-पर हार नहीं मृत्यु,
इन दो पलों के बीच ही तो
लिखते हम जीवन की सृष्टि।
कर्म, धड़कन, स्वप्न मिलाकर,
बनता छोटा-सा पुल प्यारा।
बीच में जीवन की धुन है…
— रूपेश कुमार
