बाप का साया
सिर पर साया
चलते हुए कदमों में
निडर सपने
धीमी धूप-सी
बातों में घुली रहती
पिता की सीख
आँखों के भीतर
साहस का एक दीपक
पिता जलाते
थकी शामों में
माथे को छूकर कहते
सब अच्छा है
कंधों की गर्मी
दूर तलक साथ चलती
पिता की परछाई
बिना कहे ही
दिल का हर बोझ हल्का
कर देते वो
बन्द मुट्ठियों में
पिता का विश्वास भरा
राहें खुलतीं
समय रुक जाए
जब यादों में उभरें
उनके कदम
अँधेरों में भी
उम्मीद जगाते रहते
उनके किस्से
हर धड़कन में
पिता की दृढ़ दृष्टि का
साया रहता
संघर्षों में भी
पिता सा नहीं कोई
सच्चा साथी
बाप का साया
जीवन की हर राह को
रोशन करता
— डॉ. अशोक
