कविता

प्रकृति का प्रश्न

बिना मनुष्य के भी थी प्रकृति संपूर्ण,
नदियाँ बहती थीं, थी हरियाली पूर्ण।
पेड़ों की शाखें लहराती थीं मुक्त,
न था कोई शोर, न जीवन था रुग्ण।

पंछी गाते थे अपने ही सुर में,
फूल मुस्काते थे मंद-मंद गुरुर में।
नदियाँ बहती थीं अपनी ही चाल,
धरती थी शांत, आकाश था विशाल।

सूरज उगता था बिना किसी पुकार,
चाँदनी बिखरती थी हर एक द्वार।
जंगलों में था जीवन अनेक रूप,
हर प्राणी था अपने धर्म के अनूप।

फिर आया मनुष्य, विज्ञान का ज्ञान,
पर भूला वो अपनापन, छोड़ बैठा पहचान।
कटे पेड़, बुझे झरने, सन्नाटा छा गया,
प्रकृति थी वहीं, पर कुछ छूटता गया।

अब सोचो — क्या प्रकृति को ज़रूरत है हमारी?
या हमें है ज़रूरत उसकी, साँसों की सारी?
बिना मनुष्य के भी वो थी मुस्कान,
पर बिना प्रकृति के, कहाँ है इंसान?

— डॉ. मुल्ला आदम अली

डॉ. मुल्ला आदम अली

जन्म तिथि : 26 सितंबर तिरुपति, आंध्र प्रदेश शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., डी.एफ़.ए.च एण्ड टी., एचपीटी., वेबसाइट ; https://www.drmullaadamali.com यूट्यूब चैनल; https://youtube.com/@drmullaadamali प्रकाशित कृतियाँ : "मेरी अपनी कविताएं" "हिंदी कथा-साहित्य में देश-विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता" "युग निर्माता प्रेमचंद और उनका साहित्य", "नन्हा सिपाई", 24 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेख प्रकाशित, 30 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिया गया है, कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां और कविताएं प्रकाशित। पुरस्कार व सम्मान : एंटी करप्शन फाउन्डेशन द्वारा “नेशनल एजुकेशन आइकन अवॉर्ड – 2019” सोसाइटी फॉर यूथ डेवलेपमेंट द्वारा “स्वामी विवेकानंद युवा सम्मान – 2019”, विश्व संवाद परिषद की ओर से हिंदी साहित्य एवं काव्य सभा (प्रकोष्ठ) के लिए अवैतनिक प्रदेश अध्यक्ष (आंध्र प्रदेश) 2021.