गीतिका/ग़ज़ल

पिता की छाँव

करते दिल पर राज पिता थे।
घर भर के सरताज पिता थे।।

सारे घर के जीवनदाता।
हम सब के तो नाज़ पिता थे।।

कष्टों में भी फर्ज़ निभाया।
जगमग करते आज पिता थे।।

बुरी नज़र जो घर पर डाले।।
झपटें उस पर बाज पिता थे।।

हर मुश्किल में भी खुश रहते।
कैसे,यह इक राज़ पिता थे।।

सुर,लय,ताल सभी कुछ तो थे।
मधुर तरंगें साज पिता थे।।

डर भी जिन से डरता रहता।
शेरों की आवाज़ पिता थे।।

रूप देव का उन ने पाया।
ईश्वर का अंदाज़ पिता थे।।

— प्रो. शरद नारायण खरे

*प्रो. शरद नारायण खरे

प्राध्यापक व अध्यक्ष इतिहास विभाग शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय मंडला (म.प्र.)-481661 (मो. 9435484382 / 7049456500) ई-मेल-khare.sharadnarayan@gmail.com