शेर और बकरी
पीते जो एक घाट पर, शेर और बकरी पानी,
बकरी खा लेती घास, शेर की जान थी जानी।
भूखा रहकर कैसे रहता, जंगल में वह जिन्दा,
हो जाता कमजोर, आँख दिखाती बकरी रानी।
बिन ताकत कैसे, जंगल का राजा कहलाता,
करता नही शिकार अगर, खुद शिकार हो जाता।
संतुलन भी बिगड़े जंगल का, हिरन बकरी बढ़ते,
मांसाहारी शेर कैसे, शाकाहारी पशु बन पाता?
अपवाद सदा पाये जाते, जो प्रेरक बनते हैं,
कुत्ता बिल्ली कभी कभी, अठखेलियाँ करते हैं।
बचपन से पाला जिसको, हमने जिस परिवेश,
हिंसक भी हिंसा को त्याग, शाकाहारी बनते हैं।
प्रवृत्ति और प्रकृति सबकी, सदा अलग-अलग होती,
खान- पान जीने की शैली, सदा अलग-अलग होती।
जन्म मिला है जिस रूप में, कुछ कर्मों का लेखा होगा,
कर्म धर्म विचारों की परिणति, सदा अलग अलग होती।
— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन
