कविता

जय भारतमाता

जय, जय, जय हे! भारतमाता।
‘वंदेमातरम है ‘पुण्यश्लोक
कोटिक जन का संबल दाता।

जिसके वक्षस्थल गंगाजल
हिमगिरि का शोभित मुकुट भाल,
जिसके रज – कण माणिक – मुक्ता
पद धोता रत्नाकर विशाल,

हम उस भारत माँ की संतति
जिसकी स्तुति त्रिभुवन गाता।

देवों को दुर्लभ जन्मभूमि
है प्रकृति अनुचरी आभारी,
कहते सगर्व, हम हिन्दू हैं
हिन्दू संस्कृति जग से न्यारी,

दे गए अलौकिक दिव्य ज्ञान
ऋषि – मुनिवर वेदों के ज्ञाता।

हमने दशमलव – शून्य खोजे
पद्म से शंख तक प्रकट अंक,
ज्योतिषियों ने ग्रह – गति समझी
गणना दिखलायी निष्कलंक,

कौशल, संगीत, शिल्प, औषधि
हम बहु विद्या के व्याख्याता।

अपनाया ‘सत्यमेव जयते ‘
‘असदो मा गमय ‘है मूलमंत्र,
सद्धर्म,सुनीति, न्याय – बल से
पालित – पोषित शुभ लोकतंत्र,

‘वसुधैव कुटुंब ‘मान करके
हम बने विश्व के दुःख त्राता।

प्रति गति – विधि के पूरक अखण्ड
हमनें बाँटा विज्ञान – ज्ञान,
शरणागत – रक्षण हित रचते
हम अनुपम शिव-सुन्दर विधान,

हम सेवक हैं भूमण्डल के
स्वामी का भाव न मन भाता।

संकल्प लिया है ‘राष्ट्र प्रथम ‘
शुचि वैश्विक छवि देदीप्यमान,
नव पंचशील सिद्धान्तों से
जनगण होता ऐश्वर्यवान,

हम हुए सशक्त, आत्मनिर्भर
अब आँख न कोई दिखलाता।

अर्जित कर ली है सैन्य – शक्ति
प्रलयंकारी खुल गए नेत्र,
जाग्रत हैं शौर्य – पराक्रम से
जल – थल – नभ के सर्वत्र क्षेत्र,

पग रखे चंद्रमा,मंगल पर
हम हैं भविष्य के निर्माता।

अपनी ज्वलंत ज्वाला – प्रदीप्त
अब हो न सकेगी कभी लोप,
लपटों में ही होगा विनष्ट
अरि म्लेच्छ – पतंगों का प्रकोप,

घर – घर में, ऊँचे शिखरों पर
शान से तिरंगा लहराता।
जय, जय, जय हे! भारतमाता।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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