कविता

हालात ए वक्त

कुछ निष्पक्ष समय की बयार में बह रहे हैं,
सिक्के की खनक सुन
दिन को रात तो रात को दिन कह रहे हैं,
समय का चलन अब काबिले गौर है,
माननीयों का तब भी और अब भी वही दौर है,
परछाइयों से डरने वाले हिम्मत से क्या खड़े हुए,
इनके सुनहरे दौर की निशानियों को अपना बता रहे हैं
जो हैं यत्र-तत्र-सर्वत्र आज भी गड़े हुए,
जो विपरीत धारा से खुलकर लड़े
वो इतिहास के पन्नों में अपना नाम लिखा गये,
जो डरे सहमे और झुके
जबरन धकेला गया उन्हें इतना
वो अपने उसी पुराने हालात पर आ गये,
कुछ चीख चीख कर ताकत की तारीफ में इतने खो गये,
उन्हें पता ही नहीं चला कि
कब,कहां और किसके बिस्तरात में सो गये,
कुछ महामानव के शक्ल में ऐसे बसे हुए हैं,
जय जयकार करा रहे उन्हीं से जिसे फन फैला डसे हुए हैं,
गया नहीं है आज भी राजे महाराजों का दौर
जो जिम्मेदारों और मुख्तियारों को भी नचा रहे हैं,
सजी हुई है आज भी उन्हीं कोठों पर महफ़िल
भांडों,प्रजातंत्र के नीवों से बेहतरीन मुजरे करा रहे हैं,
सच बकने वाले सदा सच बिकेंगे वो कहां डरने वाले,
पैदा करके कूच करेंगे सच के खातिर मरने वाले,
झूठ की बुनियाद पर कब तक आबरू ढंक पाओगे,
सच के छोटे से बवंडर चलते ही नंगे ही रह जाओगे।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554