कविता

तख्त और ताज

तख्त पर विराजते ही,

बदल जाता है मिजाज।

बढ जाता रुबाब, रुतबा,

सिरमौर हो जब ताज।।

कर्मठता से जो करें,

जन गण मन का काम।

नेता जन प्रिय सदैव वहीं,

जो सत्यार्थी निष्काम।।

करे आदर तख्त ताज का,

जन मन का रखे ध्यान।

चारित्र्य निष्कलंक हो,

जनता हित करे सम्मान।।

ज्ञानी, सद्गुणी, बलवान,

दया धर्म करुणा सदाचार, 

अनुशासन स्वयं पालन करें,

नीति नियमों से तारणहार।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८