क्या कहना चाहे दिल
जो भी दिल कहना चाहे
तुम खुद ही समझ जाओ ना,
ख़्वाब जो देखे इन नयनों ने
अपनी आँखों में सजाओ ना।
‘बाबू–सोना–जानू–बेबी’
लबों पे ला न पाऊँ मैं,
तेरे ही नाम से जानी जाऊँ
ऐसा हुनर दिखाओ ना।
देहरी तेरी छूकर आँगन
अन्न भरा कलश ढलकाऊँ,
जन्मों-जन्मों के बंधन में
बस तेरी होकर रह जाऊँ।
हो सके तो सिर्फ़ तुम
इतना सा कर जाओ ना,
जब भी खुले ये नयन मेरे
तुम ही नज़र आओ ना।
— सविता सिंह मीरा
