कुछ लघु कथाएं
- खाली कुर्सी
हर शाम पार्क में लोग उसे उसी बेंच पर देखते थे। दाईं ओर एक कुर्सी हमेशा खाली रहती। न कोई बैठता, न वह बैठने देता।
एक दिन किसी ने हँसकर पूछा— “किसी का इंतज़ार है क्या?”
वह कुछ पल चुप रहा, फिर बोला— “इंतज़ार नहीं… याद है।”
लोग समझे— शायद पत्नी का वियोग। पर सच्चाई इससे गहरी थी। वह व्यक्ति उस कुर्सी पर कभी बैठा ही नहीं, क्योंकि वहाँ कभी कोई बैठा ही नहीं था। पूरी ज़िंदगी उसने दूसरों की भीड़ में अपने अकेलेपन को संभाले रखा।
कुछ खाली कुर्सियाँ किसी के जाने से नहीं, किसी के कभी न आने से खाली रहती हैं।
- महँगी घड़ी
पहली तनख़्वाह हाथ में आई तो उसने सबसे पहले एक महँगी घड़ी खरीदी।
माँ ने घड़ी को गौर से देखा और बोली— “इतनी क़ीमत?”
वह मुस्कराया— “अब समय की अहमियत समझता हूँ।”
दिन बीतते गए। काम, दौड़, सफलता— सब कुछ बढ़ता गया, पर माँ के साथ बैठने का समय हर दिन घटता गया।
एक दिन अस्पताल की दीवार पर लगी घड़ी अचानक रुक गई। उसी पल
माँ की साँस भी थम गई। घर लौटकर उसने अपनी घड़ी उतार दी।
समय को पकड़ने की कोशिश में हम अक्सर अपने ही लोगों को खो देते हैं।
- चुप पिता
पिता ज़्यादा बोलते नहीं थे। न डाँट, न सलाह। बेटा समझता रहा— “उन्हें मुझसे कोई उम्मीद नहीं।” जब भी कोई निर्णय लेना होता, पिता बस इतना कहते— “जैसा तुम्हें ठीक लगे।”
पिता के जाने के बाद कमरा समेटते हुए बेटे को तकिये के नीचे पुरानी फ़ाइलें मिलीं। हर साल की मार्कशीट, पहली नौकरी का ऑफ़र, यहाँ तक कि बेटे की बचपन की टूटी घड़ी भी।
बेटा देर तक बैठा रहा। पहली बार उसे एहसास हुआ— जो कम बोलते हैं, वे प्रेम को शब्दों में नहीं, संग्रह में सँजोते हैं।
- एक गिलास पानी
स्टेशन पर भीड़ थी। गाड़ियाँ आ-जा रही थीं। एक मज़दूर थका हुआ बैठा था।
उसने धीमे से कहा— “पानी मिलेगा?”
लड़के ने आसपास देखा, कोई रुका नहीं। उसने चुपचाप अपना पानी का गिलास आगे बढ़ा दिया।
मज़दूर ने पानी पिया, आँखें भर आईं— “आज किसी ने मुझे इंसान समझा।”
लड़का कुछ नहीं बोला। पर उसके भीतर कुछ बदल गया। इंसान बनने के लिए बड़े शब्द नहीं, छोटे कर्म काफी होते हैं।
- आख़िरी संदेश
मोबाइल स्क्रीन पर एक संदेश चमक रहा था— “फुर्सत हो तो बात करना।”
उसने सोचा— “आज नहीं, कल कर लूँगा।”
कल आया, पर उस नंबर से कभी कोई कॉल नहीं आया।
बाद में पता चला— भेजने वाला हमेशा के लिए चला गया था।
आज भी मोबाइल में वह संदेश है। eदn… पर जवाब अधूरा।
कुछ बातें समय पर न कही जाएँ तो उम्र भर भीतर बोलती रहती हैं।
- ख़ामोशी की जीत
हर बार जब उसे अपमानित किया गया, वह चुप रहा। लोगों ने उसे कमज़ोर समझ लिया। पर उसने अपने भीतर की आवाज़ सुनना सीख लिया था।
वर्षों बाद वही लोग उसकी शांति देखकर हैरान थे।
हर लड़ाई लड़ी नहीं जाती। कुछ जीतें मौन में होती हैं।
— डॉ. निशा नंदिनी भारतीय
