परम्परा लुप्त न हो
चूल्हे की आँच
दादी की हथेली
संस्कार जगे
पीपल की छाँव
कथाएँ साँस लें
जड़ें गहरी
मिट्टी का दीप
पीढ़ियों का उजास
रात हरे
बोली की लय
मन में उतरती
पहचान बने
सादा जीवन
पसीने की गंध
सम्मान रचे
त्योहारों में
साझी मुस्कान
रिश्ते जुड़ें
गुरु का स्पर्श
शब्दों में नहीं
दृष्टि में
परम्परा
समय से कहती
मैं हूँ
— डॉ. अशोक
