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यादों के झरोखों से 

झांकते फ़िल्मी दुनिया के अनमोल गीतकारों को,जो अल्फ़ाज़ नहीं मुहब्बत की मिठास बुनते थे,

यादों के झरोखों से झांकिए तो फ़िल्मी दुनिया के वे अनमोल शायर नज़र आते हैं, जिन के क़लम से निकले मुहब्बत भरे गीत आज भी दिल की गहराइयों  पर दस्तक दे जाते हैं। जब फ़िल्में ताज़ा रिलीज़  होती थीं, तब वे  लोगों की ज़बान पर गूंजते थे, और आज भी रेडियो की लहरों या यूट्यूब की स्क्रीन पर सुनाई दें तो वही पुरानी धड़कनें जाग उठती हैं। ये शायर न सिर्फ़ अल्फ़ाज़ के जादूगर थे, बल्कि इश्क़ की वो मिठास बुनते थे, आइए, उन चुनिंदा नामों को याद करें जो मुहब्बत को अमर बना देते हैं।साहिर लुधियानवी का नाम लीजिए तो ‘कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है’ की वो सतरें याद आ जाती हैं, जो मुकेश की आवाज़ में अमिताभ बच्चन की आंखों से रिसीं। साहिर साहब का कलम इश्क़ की उदासी को इतनी बारीकी से उकेरता था कि ‘प्यार किया तो डरना क्या’ सुनकर आज भी आशिक़ जोड़े थरथराते हैं। उनकी शायरी फ़िल्मों से निकलकर ज़िंदगी की किताब में समा गई,जैसे ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’।मजरुह सुल्तानपुरी की क़लम ने ‘तेरे बिना जिया जाए ना’ जैसे गीत रचे, जो मोहम्मद रफ़ी की बुलंदी पर चढ़कर दिलों को छू गए। मजरुह साहब के अल्फ़ाज़ में मुहब्बत की वो मस्ती थी जो ‘एक लड़की भीगी भागी सी’ में झलकती है, या ‘तेरी आंखों के सिवा’ में वो गहराई। उनकी ग़ज़लें फ़िल्मी कैनवास पर इतनी रंगीनियों के साथ बिखरीं कि आज भी शादियों में बजती हैं, जवानी लौट आती है।शकील बदायुनी को भूलना तो नामुमकिन है, जिनके ‘तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़माकर हम भी,ने दिलीप कुमार की उदासी को आवाज़ दी। ‘जाने क्या तूने कही’ या ‘रात अकेली है’ जैसे गीतों में उनकी क़लम ने इश्क़ की वो बेचैनी बांधी जो आज भी रातों को जगाए रखती है। शकील साहब के अल्फ़ाज़ पुराने होते हुए भी ताज़े लगते हैं, जैसे कोई पुराना शराब का घूंट।हसरत जयपुरी का ज़िक्र हो तो ‘ये चांद सा रोशन चेहरा’ या ‘तुम तो गए परदेस’ याद आते हैं, जो राज कपूर की मुस्कान के साथ अमर हो गए। उनकी शायरी में एक मिठास घुली थी, जो ‘तेरे हुस्न की क्या तारीफ़ करूं’ में बहती है। राजस्थान की हवाओं से सुनी ये सतरें आज भी आशिक़ों की डायरी में सजती हैं।ये शायर न सिर्फ़ गीतकार थे, बल्कि मुहब्बत के अज़ीम फ़नकार थे। उनके अल्फ़ाज़ ने फ़िल्मों को जिया, और फ़िल्में उन्हें अमर कर गईं। आज जब हम ये गीत सुनते हैं, तो वक़्त ठहर जाता है,जवानी लौट आती है, दिल जवान हो जाता है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।