गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आँगन में मेरे आ के टहलने लगी है शाम।
थोड़ी ही देर रह के निकलने लगी है शाम।।

मेला ग़मों का देख यहाँ पे लगा हुआ।
रुक मुझसे गुफ़्तगू भी तो करने लगी है शाम।।

सौदा किया था दिल का मुकर वो ही गए तो।
झूठे न फँसना जाल में कहने लगी है शाम।।

कैसे अकेले उसके बिना रहके मैं जिऊँ।
क्यों मुझपे क़हर बनके ये ढलने लगी है शाम।।

मालूम क्या वो खेलेगी जज़्बात से मेरे।
यह सोचके ही देखो दहलने लगी है शाम।।

अब जाम पे ही जाम उतरने लगे गले।
तो ख़ुदकुशी को हाथ भी मलने लगी है शाम।।

छोटी-सी ज़िंदगी में है जद्दो-ज़हद बहुत।
कोशिश में कुछ सुकूँ की फिसलने लगी है शाम।।

बहलाती इंतज़ार में दिल को भी कब तलक।
( बेताब हसरतों को ये खलने लगी है शाम।। )।।

देखो तो बात बात पे फूटे रुलाई जब।
हर बात को ही मेरी जो दलने लगी है शाम।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’