फिर से मुझे सताना
बेखबर अलमस्त मदमस्त बच्चों के पिता
खोज रहा है घुप्प अंधेरा कमरा
जी भर कर रोने के लिए,
मन से हल्का होने के लिए,
वो दिखा नहीं सकता अपना कमजोर होना,
जाहिर करना पड़ता है हरा भरा दिल का हर कोना,
एक पिता का जज्बात पिता ही समझ सकता है,
परिवार खातिर हर झंझावात से उलझ सकता है,
तमाम उलझनें,परेशानियां मानसिक होते हैं,
परिवार पर कष्ट न आये सोच वो रोते हैं,
हां मैंने देखा अपने पिता को रात भर जागते,
निदान सोचते रहते हैं बिस्तर छोड़ नहीं भागते,
पता नहीं बच्चे किस मुगालते में रहते हैं,
किसी गंभीर मानसिक तनावों से नहीं गुजरते हैं,
पिता अपने जिम्मेदारी के बोझ तले दबा होता है,
सह जाता है जब अपनों से भरपूर दगा होता है,
औलादों के रहते हर पिता अमीर होता है,
उनसे अपनी आस वो कभी नहीं खोता है,
पर कुछ औलादें दे जाते हैं जख्म बहुत बड़ा,
फिर हो जाता है वो जिंदगी और मौत के चौराहे पर खड़ा,
मौत चुन नहीं सकता क्योंकि साथ में है परिवार,
सोच वही कि औलादों पर आ न जाये दुश्वार,
बच्चों का दिया हर दर्द हर जख्म कमजोर करता है,
शरीर के जख्म भर जाएंगे पर
दिल का जख्म कहां भरता है,
मेरे दर्द मेरे जज्बात ऐ जमाना किसी को न बताना,
सताने का शौक भरा न हो तो फिर से मुझे ही सतना।
— राजेन्द्र लाहिरी
