ज़िन्दगी
कभी तो धूप-धूप कभी छाँव सी रही
क़दम क़दम पे किसी ज़ख़्मी पाँव सी रही
धीमे चली कभी, तो कभी तेज़ दौड़ती
शहर लगी कभी, तो कभी गाँव सी रही
ग़ैरों से मिली कभी गहरे प्यार की तरह
तो कभी अपनों से मिले इक घाव सी रही
गहराईयों में दिल की उतरती करीबियाँ
मन ना मिले, ऐसे किसी दुराव सी रही
सफ़र में चलते-चलते जब थक गई तो “गीत”
ख़ेमों में कटती रात के पड़ाव सी रही
— प्रियंका अग्निहोत्री ‘गीत’
