कविता

कुछ ऐसे पुरुष

हॉं मायावी कलयुग में आज भी कुछ ऐसे पुरुष जीवित है,
जो ज़िम्मेदारियों का दामन एकधार जीवन पर्यन्त ढोतें हैं,
वे बिना किसी शिकायत हर रिश्ते को नसीब की इनायत मान लेते,
और अपनी इस चुप्पी को जीवन का अहम हिस्सा बना लेते ।

वे राम कृष्ण या बुद्ध के जैसे कोई युगपुरुष अवतारी नहीं,
पर उन्होंने हर कठिनाई ऑंसुओं को अन्तःकरण में दबा सही,
वे मॉं पत्नी बहन बच्चों समाज घर बाहर में पीसते चले जाते,
और सब को मनाते-मनाते दिल में दर्द का सैलाब गढ़ते जाते ।

एक पत्नी व्रत धारी नहीं करते है वे पैतृक संस्कारों से हेरा फेरी,
और अपने सपनों की तिलांजलि देने में नहीं करते जरा भी देरी,
बना दिया जाता है उनको शुरू से ही कठोर और सुखा तना,
और डाल दिया जाता है धीरे से उनके कंधों पर बोझ घना ।

सिखाया जाता हमेशा खुद से पहले परिवार से करना है तुम्हें प्यार,
नहीं कर सकते तुम किसी की अपेक्षाओं और उम्मीदों से इंकार,
उत्सव मनाता है समाज उनके जन्म पर बस पहला व आखिरी,
और थोप देता है भूत-भविष्य की सारी अगली पिछली जिम्मेवारी ।

उनकी सादगी को कमज़ोरी समझ दी जाती है कई शाब्दिक यात्नाएं,
और धीरे-धीरे हृदय के एक कोने में मृत होती जाती उनकी संवेदनाएं,
पर नहीं लिखी जाती है उन पर कभी कोई कविता या कोई ग़ज़ल,
और नहीं होती है उनके बहुमूल्य त्याग पर किसी की ऑंखें सजल ।

पर सच तो ये है ऐसे ही कई पुरूषों ने भी संभाला है परिवार,
वे आगे बढ़ते जाते और सह लेते है जीवन में मिली हर फटकार,
अपने अधूरेपन को सांझा करने के लिए ढूॅंढते है वो भी एक किनारा,
शायद कभी कोई मिले जिसको बता सके मैने अकेले क्या-क्या हारा ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु