ग़ज़ल
जाल – जंजाल है
हाल भी बेहाल है
मुद्दतों से कट रही है
ऐसे ही, कमाल है ।
अश्क है , न रस्क है
ये आँख यूं ही लाल है
देख के न देखने की
हाँ , हमे मलाल है
जोड़ते रहे जो कभी
टूटने का साल है ।
होठ हंस पड़ें तो क्या
न सोचिए निहाल है
जुम्बिश-ए-जां है अगर
तो उनका ही ख्याल है ।।
— साधना सिंह
