छोटे-छोटे संकल्प समय के साथ चाबी बन जाते हैं
लाखों की कीमत वाली गाड़ी सड़क पर दौड़ती हुई जितनी आकर्षक लगती है, उतनी ही असुरक्षित भी हो सकती है यदि उसके पास सही चाबी और मजबूत ब्रेक न हों, चाबी इंजन को चलाती है और ब्रेक उसे समय पर रोकते हैं, इन दोनों के बिना वही गाड़ी जानलेवा साबित हो सकती है, ठीक इसी प्रकार करोड़ों की लागत से बना हुआ भव्य मकान, ऊँची दीवारें, सुन्दर फर्नीचर और चमकदार सजावट के बावजूद तब तक सुरक्षित नहीं माना जा सकता जब तक उसके दरवाज़े पर लगा छोटा-सा ताला मज़बूत न हो, घर की पूरी संपत्ति, वर्षों की मेहनत और परिवार की सारी पूँजी उस छोटे-से धातु के टुकड़े पर निर्भर होती है, जो दिखने में साधारण होता है पर भीतर की हर अमानत का रक्षक बन जाता है, जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि बड़ी से बड़ी चीज़ें भी अक्सर बहुत छोटी-छोटी व्यवस्थाओं पर टिकी होती हैं, ये व्यवस्थाएँ न दिखाई देती हैं, न ही अधिकांश लोग उनका महत्व समझते हैं, लेकिन सुरक्षा और संतुलन का वास्तविक आधार वही बनती हैं। मनुष्य का व्यक्तित्व भी कुछ-कुछ ऐसा ही है, बाहर से दिखने वाली चीज़ें,जैसे सुन्दर चेहरा, महँगे कपड़े, ऊँचा पद, बड़ा घर या गाड़ी,सब गाड़ी की बॉडी और घर की सजावट की तरह हैं, वे दूसरों की नज़र को तो खींचती हैं लेकिन किसी भी संकट में हमें बचाने की शक्ति उनमें नहीं होती, जब जीवन मोड़ लेता है, परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं, लोग साथ छोड़ने लगते हैं, तब यह बाहरी चमक बेकार हो जाती है, उस समय जो चीज़ हमें गिरने से रोकती है, वह है हमारी सोच का ब्रेक और स्वभाव का ताला, यदि सोच सकारात्मक, संयमित और वास्तविक हो, तो कठिन से कठिन हालात में भी मन आशा की रोशनी देख लेता है, और यदि स्वभाव नम्र, करुणामय और सच्चा हो, तो रिश्ते टूटने की बजाय और गहरे हो जाते हैं। सोच हमारे भीतर का वह इंजन है जो हर सुबह को अर्थ देता है, जैसे ही आँख खुलती है, पहला विचार दिन की दिशा तय कर देता है, अगर पहला विचार शिकायत, निराशा या किसी के प्रति नफ़रत का हो, तो पूरा दिन धीरे-धीरे उसी रंग में रंगने लगता है, लेकिन यदि मन कृतज्ञता से भरकर उठे, यह महसूस करे कि एक और दिन मिला है कुछ अच्छा करने का, अपने आप को सुधारने का, किसी दुखी चेहरे पर मुस्कान लाने का, तो वही दिन साधारण होते हुए भी असाधारण बन जाता है, सकारात्मक सोच का अर्थ यह नहीं कि हम कठिनाइयों को नकार दें, बल्कि इसका अर्थ है कि हम कठिनाइयों के भीतर छिपा सबक और अवसर देखना सीखें, जो व्यक्ति हर घटना में सीख खोज लेता है, वह कभी टूटता नहीं, वह गाड़ी की तरह है जिसके ब्रेक कितनी भी तेज़ रफ़्तार में चलने पर उसे समय पर रोक लेते हैं, ऐसे लोग आवेश में आकर ऐसे निर्णय नहीं लेते जो बाद में पश्चाताप का कारण बनें। स्वभाव दूसरी चाबी है, यह हमारे व्यवहार, भाषा, चाल-ढाल और हमारी उपस्थिति से झलकता है, किसी से मिलते ही जो पहला प्रभाव पड़ता है, उसमें शब्दों से अधिक स्वभाव की भूमिका होती है, एक ही वाक्य प्रेमपूर्वक कहा जाए तो मरहम बन जाता है, वही वाक्य कटुता के साथ कहा जाए तो तीर की तरह घायल कर देता है, स्वभाव ही तय करता है कि हम अपने से छोटे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, किसी से हमें लाभ न हो, फिर भी क्या हम उसके प्रति सज्जन बने रहेंगे या नहीं, यह परीक्षा हमारे वास्तविक चरित्र की होती है, नम्र स्वभाव वाला व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की जल्दी में नहीं रहता, वह समय को अपना साथी बनाकर धीरे-धीरे विश्वास जीतता है, उसके आसपास के लोग निश्चिंत होकर खुलते हैं, क्योंकि उन्हें महसूस होता है कि यहाँ कोई छल नहीं, कोई दिखावा नहीं, केवल सच्ची मानवता है, यही स्वभाव जीवन के हर रिश्ते के द्वार पर लगा वह ताला है जो अविश्वास, ईर्ष्या और स्वार्थ जैसे चोरों से रिश्तों को बचाकर रखता है। अनुशासन और आत्मनियंत्रण इन दोनों को संभालने वाली तीसरी शक्ति हैं, जिस तरह बेहतरीन इंजन और महँगी कार भी बेकार है यदि ब्रेक ढीले हों, उसी तरह उच्च शिक्षा, प्रतिभा और प्रतिभाशाली सोच भी हानिकारक हो सकती है यदि व्यक्ति अपने क्रोध, वासना, लालच और अहंकार पर ब्रेक न लगा सके, कई बार एक गलत क्षण में लिया गया निर्णय पूरी ज़िंदगी की मेहनत को नष्ट कर देता है, किसी पर अनायास बरसा दिया गया क्रोध, स्वार्थ में आकर किया गया छोटा-सा छल, या अपने आपको साबित करने के लिए बोले गए कुछ झूठ, यही वे पल होते हैं जहाँ आत्मनियंत्रण का ब्रेक हमें बचा सकता है, यदि व्यक्ति ने अपने भीतर यह क्षमता विकसित कर ली हो कि वह उत्तेजना के क्षण में भी दो पल ठहरकर सोच सके, तो उसके निर्णय अधिक संतुलित होते हैं, वह अपने और दूसरों के लिए सुरक्षा कवच बन जाता है, यही आत्मानुशासन है जो सोच को भी नियंत्रित करता है और स्वभाव को भी कोमल बनाए रखता है। आधुनिक जीवन में जहाँ सफलता का अर्थ अक्सर धन, प्रसिद्धि और प्रभाव से जोड़ा जाता है, वहाँ यह समझना और भी आवश्यक हो जाता है कि इन सबकी तुलना में सोच और स्वभाव कहीं अधिक कीमत रखते हैं, असली सफलता वह है जिसमें मन शांत हो, रात को नींद चैन से आए, और यह महसूस हो कि दिन भर किसी का दिल दुखाए बिना जी लिया, हजारों परिचितों से भरा जीवन उस एक व्यक्ति के आगे फीका पड़ जाता है जिसके साथ बिना डर, बिना संकोच, पूरी सच्चाई के साथ जी भरकर बातें की जा सकें, ऐसे संबंध केवल अच्छे स्वभाव और स्वच्छ सोच से ही जन्म लेते हैं, धन से खरीदे नहीं जा सकते, इसलिए यदि कभी अपने जीवन की दिशा पर संशय हो तो अपने आप से केवल दो प्रश्न पूछ लेना चाहिए,मेरी सोच मुझे ऊँचा उठा रही है या नीचे खींच रही है, और मेरा स्वभाव मेरे आसपास के लोगों के लिए आरामदायक है या बोझ, उत्तर यदि ईमानदारी से दिया जाए तो आगे का रास्ता अपने आप स्पष्ट हो जाता है। हर सुबह जब हम “सुप्रभात” या “गुड मॉर्निंग” कहते हैं, तो यह केवल औपचारिक अभिवादन न रहे, बल्कि अपने लिए एक गहरा संकल्प बन जाए, जैसे ही नया दिन शुरू हो, भीतर से आवाज़ आए कि आज अपनी सोच को शिकायत से बचाकर कृतज्ञता की ओर मोड़ना है, अपने स्वभाव से किसी को चोट नहीं पहुँचने देना है, चाहे जितनी जल्दी हो, चेहरे पर मुस्कान रखना है और भाषा को नरम बनाए रखना है, यही छोटे-छोटे संकल्प समय के साथ वह चाबी बन जाते हैं जो हमारी गाड़ी को सही दिशा में चलाती है, वही ताला बन जाते हैं जो हमारे व्यक्तित्व को हर नकारात्मकता से सुरक्षित रखता है, और तब हमारा जीवन केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक भी हो उठता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
