अनुवाद
कहो संभव है कभी कोई
कर पाये अनुवाद प्रेम का?
यदि असंभव यह नहीं है तो
शुरू करो संवाद प्रेम का।
पार्श्व में प्रियवर जब हों तो
मौन बन जाता साज़ प्रेम का।
प्रेम-रंजित फिर इस हृदय को
मिल रहा है प्रसाद प्रेम का।
पास आ जाते जब हृदय दो ,
चख लेते तब स्वाद प्रेम का।
मन वृन्दावन हो जाए जब,
दे जग सारा दाद प्रेम का।
— सविता सिंह मीरा
